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संस्थापक महर्षि आदर्श भारत अभियान

वैदिक शिक्षा

प्रबुद्धता के लिए शिक्षा
मस्तिष्क के पूर्ण विकास के लिए चेतना पर आधारित शिक्षा

महर्षि कोटेशन

महर्षि प्रणीत चेतना पर आधारित शिक्षा वैदिक शिक्षा है जो प्राकृतिक विधानों के पूर्ण ज्ञान पर आधारित है । महर्षि जी ने शिक्षा के मूल के विलुप्त तत्व शुद्ध चेतना के क्षेत्र (भावातीत चेतना) को प्रकाशित किया है, जो विचार के स्रोत पर निहित है एवं प्राकृतिक विधानों के उद्गम का स्रोत है । भावातीत चेतना का अनुभव, जो मस्तिष्क की पूर्ण कार्यप्रणाली को जागृत करता है, प्रत्येक विद्यार्थी की पूर्ण सृजनात्मक सामथ्र्य एवं आंतरिक प्रसन्नता को प्रकट करना संभव बनाता है ।

जानने की प्रक्रिया

चेतना जीवन का मुख्य संवाहक है । महर्षि वैदिक शिक्षा प्रणाली में, संस्थाएं चेतना का पूर्ण सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक ज्ञान उपलब्ध कराती हैं, जो विद्यार्थियों के जीवन में समस्त संभावनाओं का द्वार खोलती हैं । महर्षि वेद विज्ञान की तकनीक द्वारा, संस्थाएं चेतना के क्षेत्र में कौशल प्रदान करती है, विद्यार्थी को सब कुछ प्राप्त करने एवं पूर्ण जीवन जीने में समर्थ बनाती हैं ।

जीवन का यह अत्यन्त महत्वपूर्ण तत्व, चेतना का अध्ययन, दुर्भाग्यवश शिक्षा की मुख्यधारा से विलुप्त रहा है । यही कारण है कि जीवन का वृक्ष पृथ्वी पर अपनी जड़ों से पृथक रहा है एवं इसकी तेजस्विता का स्रोत विलुप्त हो गया । जीवन वृक्ष ने अपना पोषण खो दिया एवं फल रहित हो गया । चेतना की आनंदमयिता निष्क्रिय हो गयी मानव मन में दुख ने अपना स्थान बना लिया, मानव जागृति एवं सारे संसार में समस्याएं व्याप्त हो गईं ।

अब इस वैज्ञानिक युग में प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसकी अपनी चेतना के पूर्ण ज्ञान को प्राप्त करने, पूर्णानंद, स्वतंत्रता एवं परिपूर्णता में जीवन जीने का समय आ गया है । महर्षि संस्थाएं प्रत्येक व्यक्ति को चेतना विज्ञान एवं तकनीक के प्रस्तावित पाठ्यक्रम उपलब्ध कराती हैं, जो महर्षि प्रणीत वेद विज्ञान एवं प्रायोगिक तकनीक का भाग हैं ।

प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि आज विद्यमान शैक्षणिक संस्थानों में उपलब्ध शिक्षा रोजगार परक शिक्षा है, जो चेतना की उच्चतर अवस्थाओं का विकास नहीं करती एवं विद्यार्थियों को जीवन की पूर्ण सामथ्र्य जीने में सहायता नहीं करती । वर्तमान शिक्षा जीवनपरक नहीं है यह प्रबुद्धता प्रदायी नहीं है । यह विद्यार्थियों को सहज रूपेण विचार करने एवं प्रकृति के नियमों के अनुसरण में कार्य करने के लिए शिक्षित नहीं करती । इसीलिए संपूर्ण जनसंख्या कष्ट एवं तनाव में है । संघर्ष, अपराध एवं आतंकवाद प्रत्येक देश में व्याप्त है एवं मानव जीवन सर्वत्रा समस्याओं से आच्छादित है ।

महर्षि संस्थाएं उन लोगों के लिए है, जो अपनी पूर्ण सृजनात्मक सामथ्र्य को विकसित करना चाहते हैं, प्राकृतिक विधानों का सहयोग प्राप्त करना चाहते हैं, अपने राष्ट्र का प्रकाशपुंज बनना चाहते हैं एवं संसार को स्थायी शांति एवं प्रसन्नता की ओर अग्रसर करना चाहते हैं ।

प्रत्येक राष्ट्र का उच्चतम शैक्षणिक लक्ष्य आदर्श नागरिकों, आदर्श समाज, आदर्श राष्ट्र का निर्माण करना है एवं यह उन व्यक्तियों द्वारा किया जाना है जो उनके अपने लक्ष्यों को परिपूर्ण करने के साथ-साथ अन्यों के हितों एवं संपूर्ण समाज की प्रगति को धारित करने में समर्थ हों । इस लक्ष्य को एक जीवंत वास्तविकता बनाने के लिए, शिक्षा को देश के सर्वाधिक मूल्यवान संसाधन-प्रत्येक नागरिक के मानव मस्तिष्क की पूर्ण सामथ्र्य को जागृत करना ही चाहिए ।

शिक्षा को व्यक्ति के जीवन में पूर्णता प्राप्त करने के लिए संवर्धित करने की प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए । शिक्षा किसी भी व्यक्ति को सहजरूपेण प्राकृतिक विधानों की पूर्ण सृजनात्मक बुद्धिमत्ता को उपयोग में लाने में समर्थ बना सकती है । उसके समस्त विचार, वाणी एवं कार्य सहजरूपेण शांति की मौन शक्ति द्वारा धारित होंगे जो सृष्टि में समस्त क्रिया में व्याप्त हैं ।

प्रत्येक मानव मस्तिष्क की सामथ्र्य असीम, अनंत है । प्रत्येक व्यक्ति का मस्तिष्क बुद्धिमत्ता के उस स्तर का अनुभव करने की भौतिक मशीनरी से सुसज्जित है, जो समस्त ज्ञान का सागर है, समस्त ऊर्जा, बुद्धिमत्ता एवं आनंद का सागर है ।

आज विद्यालयों अथवा विश्वविद्यालयों में दी जाने वाली विखंडित, बुद्धि परक शिक्षा मस्तिष्क की पूर्ण रचनात्मक सामथ्र्य का उपयोग नहीं करती। मस्तिष्क के केवल एक छोटे से भाग का ही उपयोग करने से, उक्त शिक्षा एक समय बाद मस्तिष्क के अन्य भागों को पंगु बना देती है ।

व्यक्ति के जीवन की सामथ्र्य असीम है, प्रत्येक व्यक्ति की बुद्धिमत्ता का क्षेत्र असीम है प्रत्येक व्यक्ति को सब कुछ जानने सब कुछ सहजरूपेण सही करने एवं प्राकृतिक विधान के सहयोग द्वारा सब कुछ प्राप्त करने में समर्थ होना चाहिए । ऐसे एक पूर्ण व्यक्ति का निर्माण करना ही महर्षि शैक्षणिक संस्थाओं का प्रयोजन है ।

वास्तविकता यह है कि ‘जीवन आनंद है’, ‘जीवन समस्त संभावनाओं का क्षेत्र है’ - प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा अनंत रूप में चेतना की आत्म-परक अवस्था है एवं अनंत शांति की इस अवस्था में समस्त संभावनाओं का जीवंत क्षेत्र है ।

महर्षि शैक्षणिक संस्थाएं शिक्षा में पूर्णता को सम्मिलित करने के लिए स्थापित की गई हैं एवं अन्य शैक्षणिक संस्थाओं के उद्देश्य के परे, प्रत्येक मस्तिष्क में समस्त ज्ञान को उपलब्ध कराती हैं ।

महर्षि संस्थानों में प्रत्येक शिक्षक उसके अपने विषय द्वारा ज्ञान के संपूर्ण क्षेत्र को जानता है । यह इसलिए है क्योंकि विज्ञान, कला एवं वाणिज्य के क्षेत्रों में नवीनतम खोजों ने प्रत्येक विषय -भौतिकी, रसायन, गणित इत्यादि के स्रोत को पूर्णज्ञान, प्रकृति के समस्त नियमों के एकीकृत क्षेत्र में चिन्हित कर लिया है ।

शोध स्पष्टतया संकेत करते हैं कि आज शिक्षा इस असीम सामथ्र्य को अनुभव नहीं करती सिवाय उन विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के जो चेतना पर आधारित, आत्मा आधारित शिक्षा द्वारा विद्यार्थियों की चेतना को विकसित कर रहे हैं । महर्षि प्रणीत शिक्षा प्रणाली द्वारा हम प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क की पूर्ण सामथ्र्य को जागृत करने के पूर्ण ज्ञान को देकर शिक्षा की विसंगतियों को दूर करेंगे ताकि मनुष्य पूर्ण सृजनात्मक सामथ्र्य का उपयोग कर सके, जिसके साथ वह वास्तव में जीवन में पूर्णता जीने, स्वार्गिक जीवन जीने के लिए जन्मा है ।

शिक्षा के लक्ष्यों को परिपूर्ण करने के लिए चेतना पर आधारित शिक्षा

गहन शोध एवं चेतना पर आधारित शिक्षा के साथ दशकों के अनुभव ने प्रदर्शित किया है कि यह पद्धति, जो किसी देश में विद्यमान पाठ्यक्रम में चेतना के अध्ययन एवं शोध को समावेशित करती है, वर्तमान शिक्षा को दुर्बलताओं को समाप्त करती है ।

शोध ने प्रमाणित किया है कि चेतना पर आधारित शिक्षा देने वाले विश्वविद्यालय एवं विद्यालयों में विद्यार्थियों ने अन्य संस्थानों की तुलना में मानसिक क्षमता, शैक्षणिक उपलब्धियों, स्वास्थ्य, एवं सामाजिक व्यवहार में महत्वपूर्ण सुधार किये हैं । प्रारंभिक एवं उच्चतर स्तरों पर वर्ष दर वर्ष चेतना पर आधारित शिक्षा देने वाले विद्यालयों में विद्यार्थियों की कक्षाएं, जो प्रवेश के समय प्रदर्शन के औसत स्तर पर थीं, अपने राष्ट्रों में उनके स्नातक होने तक राष्ट्रीय मानक परीक्षाओंं में उच्चतम अंक प्राप्त करने वालों में थीं । उन्होंने स्वयं को विषयों के विस्तृत क्षेत्र में यथा विज्ञान, गणित, वक्तृत्व, इतिहास, कविता, नाट्य, कला, संगीत एवं खेल में असाधारण रूप से शीर्ष राज्य स्तरीय एवं राष्ट्रीय पुरुष्कार जीत कर विशिष्ट बनाया । ये वैज्ञानिक अनुसंधान एवं शैक्षणिक परिणाम इस दस्तावेज में वर्णित शोध को अतिरिक्त समर्थन प्रदान करते हैं जो संकेत करते हैं कि चेतना पर आधारित शिक्षा मस्तिष्क सामथ्र्य के वृहतर उपयोग को विकसित करती है ।

अनुभव एवं शोध यह भी दर्शाता है कि जब किसी विश्वविद्यालय अथवा विद्यालय अपने पाठ्यक्रम में समस्त विद्यार्थियों के लिए चेतना पर आधारित पाठ्यक्रम को समावेशित करता है तो वांछित परिवर्तन एवं शैक्षणिक प्रदर्शन व्यवहार में घटित होते हैं । विद्यार्थी ज्ञान के लिए उत्साह, अधिक जागृत, सृजनात्मक होते हैं एवं उत्तम नागरिक के रूप में विकास करते हैं । वे अन्यों के हितों को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने की क्षमता भी प्राप्त करते हैं । शीघ्र ही वे ‘समस्त ज्ञान के फल’ समस्या विहीन, प्रसन्न, स्वस्थ जीवन का प्राकृतिक विधानों के साथ सहज सामंजस्य में आनंद लेते हैं ।

इसके अलावा, जब विद्यार्थियों का बड़ा समूह भावातीत ध्यान एवं टी.एम.-सिद्धि कार्यक्रम और योगिक उड़ान का एक साथ अभ्यास करता है तो संपूर्ण समाज में सतोगुण एवं सामंजस्य का प्रभाव निर्मित होता है । नगर, राज्य अथवा राष्ट्र में यह समूह के आकार पर निर्भर करता है । इस प्रभाव को लगभग 50 अध्ययनों द्वारा प्रमाणित किया है, जो नकारात्मक प्रवृत्तियों में कमी एवं समाज के जीवन में गुणवत्ता में सुधार को दर्शाते हैं । समाज में सतोगुण का यह प्रभाव जिसे ‘महर्षि प्रभाव’ के रूप में जाना जाता है, योगिक उड़ान के अभ्यास के दौरान मस्तिष्क की तरंगों में सतोगुण की वृद्धि की अभिव्यक्ति है । इस प्रकार से समाज में सामंजस्यता का विकास पूर्ण मस्तिष्क सामथ्र्य के विकास के साथ मूलभूत रूप से संबद्ध है ।