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संस्थापक महर्षि आदर्श भारत अभियान

वैदिक स्वास्थ्य

रोग विहीन समाज के निर्माण के लिए निवारोन्मुखी स्वास्थ्य उपचार

महर्षि कोटेशन

आयुर्वेद संसार की सबसे पुरानी, सर्वाधिक पूर्ण एवं अति समग्र प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली है । आयुर्वेद प्राचीन भारत की वैदिक सभ्यता में उद्भुत हुआ विज्ञान है एवं इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अधिकृत रूप से स्वीकार किया गया है ।

महर्षि वैदिक स्वास्थ्य पद्धति एवं महर्षि वैदिक औषधियाँ महर्षि जी द्वारा पुनस्र्थापित पूर्ण एवं शुद्ध आयुर्वेद, जो वैदिक ग्रंथों में वर्णित है का प्रतिधित्व करती है । महर्षि वैदिक स्वास्थ्य पद्धति भलींभाँति परीक्षित है, हानिकारक प्रभावों से रहित है, रोगों के निवारण, स्वास्थ्य व दीर्घायु को देने वाली एवं शरीर की आंतरिक चेतना को सजीव करने वाली है। ये सभी गुण वैदिक चिकित्सा में शरीर के स्व-उपचार के आधार माने गये हैं ।

वैदिक स्वास्थ्य प्रणाली शरीर की आंतरिक चेतना को जीवंत करती है एवं इसके द्वारा शरीरिकी की तेजस्विता को संधारित करती है । यह प्रणाली मानव शरीर एवं ब्रह्माण्ड की संरचना में इसके सहयोगियों-सूर्य, चन्द्र, ग्रहों के मध्य ज्योतिष, योग, स्थापत्य वेद, धनुर्वेद एवं वैदिक साहित्य के समस्त अन्य विषयों द्वारा एक स्वस्थ संबंध भी संधारित करती है ।

हर्बल उपचार

स्वास्थ्य की ये धारायें स्वास्थ्य की किसी भी विद्यमान अन्य प्रणालियों में उपलब्ध नहीं हैं, जिसके कारण से वर्तमान स्वास्थ्य उपचार प्रणाली न केवल अपूर्ण है, बल्कि भयावह भी पायी गयी है ।

स्वास्थ्य का निर्माण करने वाले तत्व

प्राकृतिक विधानों का क्षेत्र, अव्यक्त के अनन्त क्षेत्र से व्यक्त के अनंत क्षेत्र तक विस्तारित है अनंतता का यह गुण प्राकृतिक विधानों का गुण है, जिसमें प्रकृति के विभिन्न नियमों के समस्त बिखरे हुए गुण इसके समग्रता में सम्मिलित हैं ।

यही कारण है कि स्वास्थ्य, जिसे संपूर्णता के रूप में परिभाषित किया जाता है, प्राकृतिक विधानों के दोनों तत्वों-समग्र एवं विशिष्ट, एक पूर्णतः एकीकृत एवं संतुलित अवस्था में संरचित हैं । जब तक प्राकृतिक विधानों के इस पूर्ण ज्ञान पर विचार नहीं किया जाता, तब तक समग्र स्वास्थ्य उपलब्ध नहीं होगा एवं पूर्ण स्वास्थ्य-पूर्ण संतुलन सदैव अनुपलब्ध होगा । आधुनिक वैज्ञानिक स्वास्थ्य पद्धति के उपयोग ने आधुनिक औषधि की सीमाओं को प्रदर्शित कर दिया है । केवल औषधि प्रधान स्वास्थ्य उपचार पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करने में असमर्थ है । स्वास्थ्य उपचार को स्वास्थ्य के समग्र एवं विशिष्ट दोनों तत्वों की देखभाल करनी चाहिए, जो पूर्ण स्वास्थ्य का निर्माण करते हैः


  • शरीरिकी
  • शरीरिकी के मूल में चेतना
  • पर्यावरण का प्रभाव
  • भवनों का प्रभाव जिसमें व्यक्ति रहता अथवा कार्य करता है
  • दूरस्थ पर्यावरण का प्रभाव : सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र
  • समाज पर सामूहिक स्वास्थ्य का प्रभाव ।
रोगविहीन, स्वस्थ एवं प्रबुद्ध समाज का निर्माण

महर्षि वैदिक स्वास्थ्य पद्धति की प्रभावशीलता मानव शरीरिकी के मूल में प्राकृतिक विधानों की पूर्ण बुद्धिमत्ता को उपयोग में लाने की इसकी क्षमता में निहित है - प्राकृतिक विधानों के उन समग्र तत्वों को उपयोग में लाने के लिए जो शरीरिकी की संरचना करते हैं एवं शरीर व मन के समस्त क्षेत्रों की कार्यप्रणाली को एकीकृत करते हैं । इसके परिणामस्वरूप, विचार एवं व्यवहार सहजरूपेण प्राकृतिक विधानों के अधिकाधिक सामन्जस्य में होते हैं, जो उत्तम स्वास्थ्य का आधार हैं। महर्षि वैदिक स्वास्थ्य पद्धति प्राकृतिक विधानों के समग्र एवं विशिष्ट तत्वों के मध्य संतुलन बनाये रखती है। यह असंतुलन के किसी भी स्तर से प्रारंभ करती है एवं असंतुलन को समाप्त करते हुए संतुलन के स्तर-मन, शरीर, व्यवहार एवं पर्यावरण के एकीकरण पर पहुँचती है ।

एक पूर्णतया स्वस्थ व्यक्ति के किसी भी लक्ष्य को पूर्ण करने की प्राकृतिक विधानों की पूर्ण संगठनात्मक शक्ति के सहजरूपेण उपयोग की स्वाभाविक क्षमता के साथ प्रबुद्धता की अवस्था में जीता है । बीमारी मूलतः प्राकृतिक विधानों के उल्लंघन के कारण उदित होती है, जिसके पीछे प्राकृतिक विधान के ज्ञान की कमी है, जो व्यक्ति को दुर्बल बनाती है एवं व्यक्ति में एवं समाज में तनाव निर्मित करती है ।

महर्षि वैदिक स्वास्थ्य पद्धति प्राकृतिक विधान के पूर्ण ज्ञान द्वारा, पदार्थीय सृष्टि में इसकी समस्त अभिव्यक्तियों के साथ, व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वास्थ्य को लागू करती है । यह जीवन को शीघ्रता से प्राकृतिक विधानों के अनुसरण में लाती है ।

जब प्राकृतिक विधानों की पूर्णता शरीरिकी के प्रत्येक भाग में पूरी तरह जागृत हो जाये, तब महर्षि वैदिक स्वास्थ्य पद्धति वास्तव में आनंदित होती है। स्वास्थ्य की इस संतुलित अवस्था में, प्रत्येक कोशिका एवं संपूर्ण शरीर की समग्र कार्यप्रणाली के मध्य एवं शरीरिकी के व्यक्तिगत भागों की चेतना, शरीरिकी की समग्र चेतना एवं समष्टि की चेतना जो संपूर्ण सृष्टि को व्यवस्थित करती है, के मध्य पूर्ण संयोजन होता है । इस पूर्ण एकीकरण के साथ समस्त विचार एवं कार्य सहजरूपेण प्राकृतिक विधानों के सामन्जस्य में आ जाते हैं एवं व्यक्ति स्वाभाविक रूप से उत्तम स्वास्थ्य का आनंद लेता है ।

महर्षि आयुर्वेद द्वारा स्वास्थ्य में सुधार

महर्षि वैदिक स्वास्थ्य पद्धति एक रोग विहीन, प्रसन्न, स्वस्थ एवं प्रबुद्ध व्यक्तियों एवं समाज के निर्माण के लिए कटिबद्ध है ।

महर्षि वैदिक स्वास्थ्य पद्धति की प्रक्रियाओं में से एक-‘महर्षि वैदिक स्पन्दन तकनीक’ ने हजारों लोगों को राहत प्रदान की है, जो गंभीर रोगों से पीडि़त थे, जिसमें आर्थराइटिस, अस्थमा, एंकजायटी, पीठ दर्द, अवसाद, पाचन समस्याएं, सिरदर्द, एवं अनिद्रा शामिल हैं। ये सब एक सहज, बिना किसी शल्य चिकित्सा साधनों द्वारा किया जाता है जिसका कोई हानिकाररक पाश्र्व प्रभाव नहीं होता ।

महर्षि जी ने व्याख्या की है कि शरीर की अपनी चेतना एक स्वस्थ शरीरिकी की उचित कार्यप्रणाली को मार्गदर्शित करती है । जब आत्म-चेतना के साथ संबंध समाप्त हो जाता है, तब रोगों के लक्षण दिखायी देने लगते हैं । महर्षि वैदिक स्पन्दन तकनीक शरीर की अन्तः चेतना को जीवंत करने एवं विहित कार्यप्रणाली को पुनस्र्थापित करने के लिए वैदिक ध्वनि, अथवा शुद्ध वैदिक स्पन्दनों का उपयोग करती है। महर्षि वैदिक स्वास्थ्य उपचार पद्धति में ऐसी कई लाभदायक तकनीक उपलब्ध हैं ।

रोगों का निवारण करना, जीवन के विकास के प्रत्येक स्तर पर व्यक्तिगत शरीरिकी से समाज की सामूहिक शरीरिकी तक, सृष्टि की ब्रह्माण्डीय संरचना तक विस्तारित करते हुए, मौसम की स्थितियों, ग्रहों व नक्षत्राों के प्रभावों को संशोधित करते हुए, सामान्य कार्यप्रणाली को पुनस्र्थापित करना व संधारित करना, ताकि सृष्टि में प्रत्येक वस्तु का प्रत्येक अन्य वस्तु के साथ संबंध संतुलन के एक उच्च स्तर पर संधारित हो, स्वस्थ एवं समन्वित हो। यह सब वैदिक स्वास्थ्य पद्धति की क्षमता में है, क्योंकि जीवन के विकास का प्रत्येक स्तर प्राकृतिक विधानों द्वारा संचालित है एवं प्राकृतिक विधानों का स्वरूप (समग्र एवं अजेयपूर्ण स्वास्थ्य)-द्धषि, देवता, छन्दस की वैदिक संहिता है ।

वैदिक स्वास्थ्य उपचार प्रणाली प्राकृतिक विधानों की स्वास्थ्य उपचार प्रणाली है । यह अत्यन्त सिद्ध है, क्योंकि यह प्रणाली व्यक्ति के स्वास्थ्य का प्रकृति के उन्हीं नियमों की श्रृंखला द्वारा निर्वहन करती है जिससे समष्टि का स्वास्थ निर्वहित होता है ।