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वैदिक उद्योग

महर्षि कोटेशन

उद्योग को उत्पादक होने, सफल एवं परिपूर्ण होने के लिए इसे विज्ञान सम्मत होना पड़ेगा-इसे सब ओर से व्यवस्थित होना पड़ेगा, ताकि यह सदैव विकासात्मक रहे एवं इसे विज्ञान सम्मत होने के लिए वैदिक होना होगा ।

किसी उद्योग में वैदिक गुण की अनुभूति वैदिक शिक्षा, वैदिक स्वास्थ्य एवं वैदिक प्रशासन द्वारा प्राप्त वैदिक चेतना से होगी । यह उद्योग से सम्बन्धित सभी के लिए-स्वामी, प्रबंधन, श्रमिक, कच्ची सामग्री का क्रय, विक्रय की प्रक्रिया, बाजार का उतार चढ़ाव, बैंकिंग प्रणाली, लाभ एवं उद्योग के लक्ष्य के लिये उद्योग के प्रत्येक स्तर पर सभी संबंधितों के लिये आनन्ददायक होगा ।

किसी उद्योग में वैदिक गुण की अनुभूति वैदिक विधान-प्राकृतिक विधानों द्वारा होगी, जो सदैव प्रत्येक वस्तु एवं प्रत्येक व्यक्ति के लिए विकासात्मक है । इस बिन्दु को स्पष्ट करने के लिए यह उल्लेखित किया जाना चाहिए कि वैदिक साहित्य को 40 क्षेत्रों में से प्रत्येक, उदाहरण के लिए ज्योतिष, स्थापत्यवेद, योग, वेदांत, न्याय, वैशेषिक, स्मृति इत्यादि-बुद्धिमत्ता की समस्त 40 शाखायें एक साथ कार्यशील होती हैं, सृष्टि के समस्त स्तरों का एक साथ पोषण करती हैं, जो चेतना की स्वतः क्रियाशील गतिमानता की अभिव्यक्त हैं-भावातीत चेतना के अव्यक्त क्षेत्र से, प्रकृति के समस्त नियमों के क्षेत्र (परमे व्योमन यस्मिन् देवा अधिविश्वे निषेदुः) से पश्यन्ति, मध्यमा एवं बैखरी में इसकी अभिव्यक्ति के समस्त स्तरों तक-जीवन के समस्त तीनों क्षेत्र-आध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक-सतत विस्तारित, सतत विकासशील सृष्टि में प्राकृतिक विधान के विकास में सारे क्षेत्रों को शामिल करते हुए, इसके द्वारा समष्टि के जीवन के साथ व्यक्तिगत जीवन की समज्यास्ता को संधारित करते हुए-महियान के साथ अणोरणीयान-एवं इसके द्वारा एक एक एकीकृत संपूर्णता-ब्रह्माण्ड में प्रत्येक वस्तु की विशिष्ट पहचान को धारित करते हुए-जो सतह पर विविधता लिये हुए है एवं प्रत्येक वस्तु के मूल में समान आधार पर एकीकृत है-बुद्धिमत्ता का आत्म-परक क्षेत्र है ।

ब्रह्माण्डीय वास्तविकता के साथ व्यक्ति का यह जुड़ाव वैदिक उद्योग का एक अत्यन्त विशिष्ट गुण है, जहां प्रत्येक व्यक्ति वैदिक चेतना का आनंद उठाता है, जो स्वाभाविक रूप से व्यक्तिगत जीवन एवं समष्टि के जीवन के मध्य सामंजस्य को बनाये रखता है, विकास के प्रयोजन को परिपूर्ण करता है एवं प्रत्येक व्यक्ति को प्राकृतिक विधानों की पूर्ण सृजनात्मकता के साथ जीने में समर्थ बनाता है । इस प्रकार से वैदिक उद्योग समाज को न केवल उद्योग के लिए पदार्थीय उत्पाद प्रदान करेगा, बल्कि इसके साथ-साथ किसी भी कार्य द्वारा उद्योग, वाणिज्य, व्यापार इत्यादि के क्षेत्रों में क्रिया सहित विकास के आध्यात्मिक प्रयोजन को परिपूर्ण करेगा, इससे प्रबुद्धता के स्तर पर प्रत्येक व्यक्ति का दैनिक जीवन सहज-रूपेण संंतुलित होगा। इस प्रकार का संतुलित एवं प्रयोजनमूलक चरित्र प्रत्येक उद्योग में महत्वपूर्ण है ।

इसका तात्पर्य है कि प्रत्येक उद्योग को वैदिक उद्योग के स्तर तक लाया जाना चाहिए, जहां प्रत्येक व्यक्ति आध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक विकास का, सर्वांगीण पूर्ण विकास का आनंद लेगा प्रत्येक व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की प्रगतिशील अनुभूति करेगा । चाहे वह उद्योग के किसी भी स्तर पर या किसी भी व्यवसाय में हो, वह आनन्द प्राप्त करेगा ।

यह विशेषता, समस्त स्तरों पर प्रगतिशीलता और परिपूर्णता, केवल वैदिक विधानों-प्राकृतिक विधानों के जीवंत धरातल पर ही उपलब्ध है । प्राकृतिक विधान सदैव प्रत्येक व्यक्ति के लिए आत्मीय हैं, क्योंकि यही जीवन है यही सृजनात्मक प्रक्रिया है, जो प्रत्येक वस्तु को सृजित करती है एवं यही विकासात्मक प्रक्रिया है । प्राकृतिक विधान वह है, जो सृष्टि के प्रत्येक कण के अन्दर बुद्धिमत्ता के रूप में जीवंत एवं क्रियाशील है एवं संपूर्ण सतत-विस्तारित सृष्टि के आधार में सक्रिय है ।

उद्योग के स्तर पर प्राकृतिक विधानों का यह ज्ञान उद्योग को सच्चे अर्थों में वैदिक बनायेगा । भारत में अब सभी बड़े अथवा छोटे उद्योगों के लिए पूर्णता के उदय का महोत्सव मनाने-उद्योगों की वैदिक विशेषता का आनंद उठाने का समय है । उद्योग के लिए यह उचित नहीं है कि जो राष्ट्रीय अस्तित्व एवं प्रगति का आधार है, उद्योग उस प्रबुद्धता के क्षेत्र से बाहर बने रहें । अब चूंकि वैदिक ज्ञान को पुनर्गठित कर लिया गया है एवं प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर प्राप्त कर लिया गया है, इसलिए प्रत्येक उद्योग में, बड़े अथवा छोटे, वेद की पृष्ठभूमि में, वैदिक उद्योग के उदय का महोत्सव मनाने का समय शीघ्रता से आ रहा है ।

वैदिक उद्योग से तात्पर्य है, समस्त क्रिया वैदिक सिद्धांतों पर आधारित हों, जो ‘योगस्थः कुरु कर्माणि’ है अर्थात् स्व में स्थापित होकर कार्य निष्पादन करें-शांतिपूर्ण मन के साथ कार्य निष्पादन (उत्तेजित, तनावग्रस्त मन नहीं)-मन की शांत व स्थिर अवस्था के साथ कार्य निष्पादन करें क्योंकि मन की अस्थिर अवस्था अस्थिर व तनावपूर्ण विचारों को आगे बढ़ायेगी, विचार सृजनात्मक नहीं होंगे, विचार की परिपूर्णता के लिए उपयोगी नहीं होंगे । किसी भी व्यक्ति के लिए दैनिक कार्य सामान्यतः रचनात्मकता को बाधित करते हैं एवं व्यक्ति की रचनात्मकता के पूर्ण प्रस्फुटन को अवरुद्ध करते हैं। वैदिक उद्योग द्वारा, समष्टि के गुण व्यक्ति की जागृति में जीवंत होंगे एवं दैनिक क्रिया कभी भी तनावपूर्ण नहीं होगी-दैनिक दिनचर्या में यह समष्टि की रचनात्मकता को अभिव्यक्त करेंगे ।

व्यक्तिगत जीवन की समष्टि के जीवन के साथ समज्यास्ता उद्योग के क्षेत्र के लिए यह अमापनीय वरदान है, जिसके महत्व को शब्दों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। यह वैदिक उद्योग का उपहार है, जो नवीन नियमों के परिचय द्वारा भारत में जीवन के गौरवान्वीकरण के लिए प्रत्येक उद्योग को प्रस्तावित किया जायेगा। वैदिक उद्योग, विधान के प्राधिकार से, भारतीय उद्योग के स्वरूप को संपूर्ण संसार में उद्योग के लिए एक उद्धरणीय उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करेंगे। भारत में वैदिक उद्योग द्वारा प्रत्येक व्यक्ति उद्योग के क्षेत्र में पूर्ण प्रबुद्धता का आनंद उठायेगा।

वैदिक उद्योग अजेय उद्योग सृजित करेगा-उत्पादन एवं बिक्री, उद्योग के समस्त क्षेत्रों में अनुकूलता, विकासात्मक स्थितियों के लिए प्राकृतिक विधान का स्वयंमेव समर्थन प्राप्त होगा-जिसका तात्पर्य है उद्योग की समस्या विहीन, प्रदूषण मुक्त, जीवन पोषणकारी विशेषता जो नित्य जीवन के लिए समस्त सुविधाएं एवं संसाधन, बिना किसी भयानक अथवा जीवन को क्षति पहुंचाने वाले तत्व के, प्रदान करती है । वैदिक उद्योग के स्तर तक उद्योग को पहुंचाने से राष्ट्रीय जीवन के समस्त क्षेत्र गौरवान्वित होंगे । वैदिक उद्योग कार्य के सभी स्तर पर संबंधितों के लिए न केवल एक नवीन सूर्योदय लायेगा, बल्कि प्रत्येेक व्यक्ति के सौभाग्य वर्धन के लिए एक प्रत्यक्ष साधन के रूप में भी कार्य करेगा, जो गलत वास्तु एवं ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव के कारण से आच्छादित रहा है ।

अभी तक उद्योगों में वैदिक कार्यक्रमों के ज्ञान की कमी रही है, जो ग्रहों, नक्षत्रों के किसी भी नकारात्मक प्रभाव को कम कर सकते हैं, पर्यावरण में सकारात्मक, जीवन पोषणकारी प्रभाव को संरक्षित करते हैं एवं प्रत्येक व्यक्ति को प्रबुद्धता में उसकी अधिकतम रचनात्मकता तक आगे ले जाते हैं । वैदिक उद्योग द्वारा, कार्यकारी घंटे 8 घंटे से घटकर 7 घंटे अथवा कम हो जायेंगे । लोगों की सृजनात्मकता में ध्यान के एक घंटे से (दिन में दो बार 30-30 मिनट) बहुत अधिक बढ़ेगी । इससे कंपनी की उत्पादकता एवं लाभ में वृद्धि होगी और कर्मचारियों को स्वाभाविक रूप से अधिक बोनस एवं लाभांश प्राप्त होगा । यह अतिरिक्त आय नियोक्ताओं एवं कर्मचारियों को वास्तु (प्राकृतिक विधान) के अनुसार नवीन स्वस्थ घरों को बनाने में समर्थ करेगी, वे एक अधिक सौभाग्यपूर्ण जीवन, एक अधिक परिपूर्ण जीवन, एक अधिक प्रगतिशील जीवन एवं एक अधिक प्रसन्न जीवन जीना प्रारंभ करेंगे ।

लोग यह नहीं जानते हैं कि उन भवनों में रहना एवं कार्य करना जो वास्तु के अनुरूप न बने हों, स्वतः ही कष्टों का मूल कारण है । गलत वास्तु में रहने के इस सिद्धांत को एक मनुष्य के उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है, जो चेतना की उनींदी अवस्था में है एवं ठीक वास्तु के सिद्धांत को ऐसे मुनष्य के उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है जो पूर्णतया जागृत चेतना की प्रबुद्ध अवस्था में है ।

वस्तुस्थिति यह है कि गलत वास्तु के स्तर को एक मनुष्य द्वारा अनुभव किये जा रहे स्वास्थ्य, प्रसन्नता, एवं सफलता के स्तर द्वारा निर्णीत किया जा सकता है एवं इसे किसी भी व्यक्ति द्वारा, किसी नगर अथवा ग्राम में लोगों के जीवन से तुलना कर के, जिनके घर अथवा कार्यालय पूर्व मुखी हों एवं उनके साथ जिनके घर अथवा कार्यालय दक्षिण अथवा पश्चिम मुखी हों, से प्रमाणित किया जा सकता है । यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है कि निवास एवं कार्यस्थलों का वास्तु सही हो ।

वैदिक उद्योग के सिद्धांत एवं कार्यक्रम प्रत्येक नियोक्ता एवं कर्मचारी के लिए पोषणकारी होंगे, एवं इसीलिए प्रत्येक नियोक्ता एवं कर्मचारी को उसके अपने पक्ष में, वैदिक जीवन के लिए वैदिक उद्योग की जीवन पोषणकारी विषय वस्तु को धारित करना चाहिए ।

आधुनिक विज्ञान वैदिक उद्योग के लाभों को प्रमाणित करती है
  • अनुपस्थिति में कमी ।
  • काम की चिंता एवं तनाव में कमी ।
  • औद्योगिक कर्मचारियों के स्वास्थ्य में सुधार ।
  • कार्य निष्पादन एवं कार्य संतुष्टि में अच्छे अनुभव ।
  • सह कर्मियों एवं पर्यवेक्षकों के साथ संबंधों में सुधार ।
  • बेरोजगारी में कमी ।
  • व्यापार निष्पादन के स्तर सुधार-कुशलता एवं उत्पादकता में वृद्धि ।
  • कार्यस्थल पर कमतर दुर्घटनाएं ।